क्या खोया, क्या पाया (एक अहम किरदार,पिता)




 एक जिंदगी मिलती है सबको। मैंने छोटी सी उम्र में जिंदगी का अहम किरदार "मेरे पिता". और तमाम उम्र ही मेरा उस शब्द से कोई वास्ता नहीं रहा। तो मानते हो ना? कि कितना कुछ खोया है मैंने। वास्तविक रूप से मुझे पता ही नहीं है कि वह किरदार होता कैसा होगा। जिंदगी के उस किरदार के साथ मेरे रिश्ते का अनुभव बिल्कुल शून्य था। तो मानते हो ना कि कितना कुछ खोया है मैंने। जो जिम्मेदारियां मुझे कभी लेनी ही नहीं थी। मगर उस मां की आंखों में आशा की चमक देखकर, मौज मस्ती को त्यागकर जो मैंने कदम बढ़ाये हैं
तो अब माने कि कितना कुछ पाया है मैंने?
बचपन मे वो पिता की धमकियां, जो मुझे मिलनी चाहिए थी। उसके बदले में मिला सिर्फ मां का प्यार। और सिर्फ प्यार ढेर सारा प्यार। तो मानते हो कि क्या कुछ खोया मैंने? हां खोया मैंने। वह धमकी में छिपा प्यार, उनके लिए मेरी मां का इंतजार।
हां खोया मैंने पिता के उन संघर्षों को देखने का अनुभव। हां खोया मैंने कांधे पर बैठकर बिताए जाने वाला बचपन।।

हां खोया मैंने बचपन। की पेरेंट्स मीटिंग के उस किरदार को और मेरे बढ़ते हुए प्यार को। क्या आपने भी खोया? अगर किरदार के रहते हुए भी खोया तो यकीन मानिए दोस्त बहुत कुछ खोया और फिर से जी लीजिए वह जिंदगी। क्योंकि दोस्त यह जिंदगी एक बार मिलती है और हर एक किरदार एक बार मिलता है।

प्रमोद रघु

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