बाबा साहेब- एक बुलंद/अमिट आवाज

बाबा साहेब आंबेडकर को दशकों बाद भी आज तक वह सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार रहे हैं.।  उनके असीमित योगदान के बावजूद उन्हें सिर्फ दलित(असंवैधानिक शब्द) नेता या ज्यादा से ज्यादा संविधान निर्माता तक सीमित कर दिया गया. उन्हें सिर्फ दलित(असंवैधानिक शब्द) आइकन समझा गया जबकि वो पूरे राष्ट्र की पहचान और सम्पूर्ण विश्व के लिए पीड़ित मुक्तिदाता की मशाल समझे जाने चाहिए थे. उन्होंने समानता, स्वतन्त्रता, भाईचारे और न्याय को आधार बनाते हुए हर वर्ग का ध्यान रख उनके मानवाधिकार, संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित किये.

आज भी ज्यादातर सिर्फ अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगो की वॉल पर ही अम्बेडकर का फोटो देखने को मिला। चूंकि अब लोगों ने अपने अपने समाज सुधारक बांट लिए है मगर ध्यान रहे अम्बेडकर समानता के लिए लाडे थे ना कि किसी particular समाज के लिए। कुछ लोग जो आंतरिक रूप से बाबा साहेब के समर्थक हैं वो लोग भी डरते हैं अपने आप को अम्बेडकरवादी कहने में। क्योंकि संभवत उनके लिए फिर लोगो का दृष्टिकोण बदल सकता है ऐसा उन्हें डर है।  मगर वो आवाज ही क्या जो सबके लिए ना उठे और वो लेखन ही क्या जिसमे किसीका दर्द ना हो।

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